प्रयागराज न्यूज डेस्क: प्रयागराज में गंगा और यमुना के संगम के बीच वैज्ञानिकों द्वारा की गई इस खोज ने पौराणिक मान्यताओं और आधुनिक विज्ञान के बीच एक नया सेतु बना दिया है। CSIR और NGRI के शोधकर्ताओं ने जमीन के नीचे जिस विशाल पैलियो नदी चैनल (Paleo-river channel) को खोजा है, वह न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि जल प्रबंधन के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
खोज की मुख्य बातें:
विशाल आकार: जमीन के नीचे दबा यह चैनल लगभग 4 से 5 किलोमीटर चौड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी गहराई और चौड़ाई गंगा और यमुना के बेस लेवल के समान है, जो इसे किसी छोटी धारा के बजाय एक स्वतंत्र बड़ी नदी साबित करती है।
वैज्ञानिक प्रमाण: डॉ. सुभाष चंद्रा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने एडवांस्ड एयरबोर्न जियोफिजिकल तकनीक और ड्रिलिंग के जरिए इसकी पुष्टि की है। यह चैनल सतह से लगभग 10-15 मीटर नीचे जलोढ़ मिट्टी की परतों में छिपा हुआ है।
लंबाई और विस्तार: अब तक करीब 200 किलोमीटर लंबे चैनल की मैपिंग की जा चुकी है, जो कानपुर तक फैला है। संभावना है कि इसका स्रोत और भी पश्चिम में हिमालयी क्षेत्रों तक हो सकता है।
क्या यही सरस्वती नदी है?
वैज्ञानिक तौर पर शोधकर्ता इसे 'पैलियो चैनल' कह रहे हैं, लेकिन इसके साक्ष्य पौराणिक सरस्वती नदी की धारणा से काफी मेल खाते हैं:
स्थान: यह ठीक उसी स्थान (गंगा-यमुना दोआब) पर मिला है जहाँ शास्त्रों में सरस्वती के बहने का वर्णन है।
संगम की पुष्टि: हालांकि शहरी बाधाओं के कारण प्रयागराज शहर के ठीक नीचे मैपिंग कठिन थी, लेकिन साक्ष्य संकेत देते हैं कि यह संगम के पास से ही गुजरती है।
अदृश्य अस्तित्व: लोक कथाओं में सरस्वती को 'अदृश्य' माना गया है, और विज्ञान ने अब जमीन के नीचे एक 'अदृश्य' नदी चैनल की भौतिक मौजूदगी प्रमाणित कर दी है।
भविष्य के लिए महत्व:
यह खोज केवल इतिहास को समझने तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भूमिगत चैनल एक एक्विफर सिस्टम की तरह काम करता है। यदि इसे बारिश के पानी से रिचार्ज किया जाए, तो यह प्रयागराज और आसपास के इलाकों में गिरते भूजल स्तर (Groundwater Level) को सुधारने में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है। साथ ही, इससे गर्मी के दिनों में गंगा और यमुना के जल प्रवाह को भी बनाए रखने में मदद मिलेगी।