प्रयागराज न्यूज डेस्क: प्रयागराज स्थित केंद्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CIFRI) के एक हालिया अध्ययन ने गंगा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को लेकर उत्साहजनक परिणाम सामने रखे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के निरंतर प्रयासों के कारण गंगा की स्वच्छता में न केवल सुधार हुआ है, बल्कि नदी के जलीय जीवन में भी सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं। अध्ययन के अनुसार, स्वच्छ पानी में पनपने वाली 'इंडियन मेजर कार्प' (IMC) मछलियों की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो पानी की गुणवत्ता सुधरने का एक बड़ा संकेत है।
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. बालासाहेब रामदास चव्हाण ने बताया कि गंगा में पाई जाने वाली लगभग 230 मछलियों की प्रजातियों में से रोहू, कतला, मृगल और कालबासु जैसी प्रमुख किस्मों (IMC) की संख्या बढ़ी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रदूषित पानी में पनपने वाली विदेशी प्रजातियां जैसे 'कॉमन कार्प' और 'तिलापिया' की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। आंकड़ों के मुताबिक, 2016 तक कुल मछलियों में IMC की हिस्सेदारी महज 12% थी, जो अब बढ़कर 24% से अधिक हो गई है, जबकि विदेशी मछलियों का हिस्सा 40% से घटकर 20% रह गया है।
सीआईएफआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धर्मनाथ झा के अनुसार, 2017 से 'नमामि गंगे' मिशन के तहत संगम क्षेत्र के विभिन्न तटों पर शोध किया जा रहा है। ये IMC मछलियाँ नदी में मौजूद सड़ती हुई वनस्पतियों और जैविक कचरे को खाकर प्राकृतिक क्लीनर का काम करती हैं। इनकी संख्या बढ़ने से गंगा में पाए जाने वाले डॉल्फिन की आबादी में भी इजाफा होने की उम्मीद है, क्योंकि डॉल्फिन इन्हीं मछलियों का शिकार करती हैं। मछलियों की वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए संस्थान ने 2024 से 2026 के बीच ही गंगा में करीब नौ लाख मछलियों के बच्चे (फिंगरलिंग्स) छोड़े हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय मछुआरों को मिल रहा है। रोहू, कतला और मृगल जैसी मछलियों की बाजार में अत्यधिक मांग और बेहतर पोषक मूल्य होने के कारण उनकी बिक्री बढ़ गई है। इससे गंगा तट पर रहने वाले मछुआरा समुदायों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जल की गुणवत्ता इसी तरह बनी रही, तो गंगा का प्राकृतिक स्वरूप और जैव विविधता फिर से अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर सकेगी।