भारत में महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर समय-समय पर चिंताएं जताई जाती रही हैं। हाल ही में जारी हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6) के ताजा और विस्तृत आंकड़े इस दिशा में एक कड़वी हकीकत बयां करते हैं। सर्वे के मुताबिक, हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में घरेलू हिंसा के कुल मामलों में 6.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में स्थिति अब भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
NFHS-6 के आंकड़े साफ तौर पर इशारा करते हैं कि शहरों के मुकाबले ग्रामीण भारत की महिलाओं को घरेलू हिंसा (Domestic Violence) का सामना कहीं अधिक करना पड़ रहा है।
सर्वेक्षण के नतीजों से पता चलता है कि समाज में जागरूकता और शिक्षा के प्रसार के बावजूद महिलाओं के प्रति सोच और व्यवहार में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है।
1. ग्रामीण बनाम शहरी क्षेत्र: हिंसा का असमान स्तर
NFHS-6 की रिपोर्ट के अनुसार, गांवों में रहने वाली महिलाओं को अपने पति या पार्टनर की तरफ से शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा का सामना शहरों की तुलना में अधिक करना पड़ता है। इसके पीछे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी, आर्थिक निर्भरता, और सामाजिक रूढ़िवादिता को मुख्य कारण माना जा रहा है।
2. गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान भी प्रताड़ना
सर्वे का सबसे हैरान और विचलित करने वाला पहलू यह है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली यह हिंसा सामान्य दिनों तक ही सीमित नहीं है:
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गर्भावस्था में हिंसा: ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली कई महिलाओं को अपनी प्रेग्नेंसी के संवेदनशील दौर में भी पार्टनर की तरफ से शारीरिक हिंसा और दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है। यह न केवल महिला के स्वास्थ्य के लिए बल्कि अजन्मे बच्चे के लिए भी बेहद खतरनाक है।
3. कम उम्र की महिलाएं और यौन हिंसा का खतरा
रिपोर्ट में युवा महिलाओं और किशोरियों (Teenagers) की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर आंकड़े सामने आए हैं:
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18-29 आयु वर्ग की स्थिति: 18 से 29 साल की कम उम्र की महिलाओं में से एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो घरेलू या सामाजिक स्तर पर उत्पीड़न का शिकार है।
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18 वर्ष से पहले यौन हिंसा: बेहद चिंताजनक बात यह है कि इस आयु वर्ग की कई युवतियों ने यह स्वीकार किया कि वे 18 साल की उम्र पार करने से पहले ही किसी न किसी रूप में यौन हिंसा (Sexual Violence) का शिकार हो चुकी थीं।
मुख्य निष्कर्ष और सकारात्मक पहलू (सिल्वर लाइनिंग)
तमाम चिंताजनक आंकड़ों के बीच राहत की एकमात्र बात यह है कि पिछले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) की तुलना में इस बार घरेलू हिंसा के कुल मामलों में 6.9% की कमी आई है।
| मानक (Indicators) |
NFHS-6 की मुख्य बातें (2026) |
| घरेलू हिंसा में बदलाव |
पिछले सर्वे के मुकाबले 6.9% की गिरावट |
| सबसे प्रभावित क्षेत्र |
ग्रामीण क्षेत्र, जहां शहरी क्षेत्रों की तुलना में हिंसा दर अधिक है |
| संवेदनशील स्थिति |
गर्भावस्था के दौरान भी महिलाओं को शारीरिक प्रताड़ना |
| युवा वर्ग पर प्रभाव |
18 वर्ष की उम्र से पहले ही कई लड़कियां यौन हिंसा की शिकार |
विशेषज्ञों का मानना है कि मामलों में आई यह मामूली गिरावट कड़े कानूनों, महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की बढ़ती सक्रियता और पुलिस हेल्पलाइन के प्रति बढ़ती जागरूकता का परिणाम है। हालांकि, प्रेग्नेंसी के दौरान हिंसा और कम उम्र में उत्पीड़न जैसे आंकड़े बताते हैं कि अभी भी ज़मीनी स्तर पर कड़े कानूनी कदमों के साथ-साथ व्यापक सामाजिक सुधार और काउंसलिंग अभियानों की सख्त जरूरत है।