प्रयागराज न्यूज डेस्क: 17 से 20 अगस्त के बीच प्रयागराज में हुई 308.1 मिमी बारिश ने शहर की जल निकासी व्यवस्था की पोल खोल दी। स्मार्ट सिटी और महाकुंभ की तैयारियों पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, अल्लापुर, मुंडेरा और करेली समेत कई इलाके पानी में डूब गए। सड़कें तालाब बन गईं, सरकारी दफ्तरों और थानों में पानी भर गया। बारिश रुकने के बाद पानी तो उतर गया, लेकिन हर साल होने वाले जलभराव का सवाल फिर खड़ा हो गया है।
सिविल इंजीनियर डॉ. अतुल जायसवाल के मुताबिक, इसका पहला बड़ा कारण मानसून से पहले नालों की सफाई में लापरवाही है। 17 अगस्त को 73.4 मिमी, 18 को 67.7 मिमी, 19 को 119.8 मिमी और 20 अगस्त को 47.2 मिमी बारिश हुई। इतनी बारिश के बीच चोक नालों ने मुसीबत बढ़ा दी। नालों का पानी सीवर में जाने, पॉलीथिन और कचरे के जमा होने और डेयरियों का गोबर नालियों में बहाए जाने से जल निकासी व्यवस्था और कमजोर हो गई है। सीवर और नालों का नेटवर्क अलग-अलग होने के बजाय कई जगह आपस में जुड़ा हुआ है।
दूसरी बड़ी समस्या नई सीवर लाइनों की है। 2014 से शहर के अलग-अलग हिस्सों में सीवर लाइन बिछाने और उन्हें एसटीपी से जोड़ने पर 2500 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं, लेकिन कई इलाकों में घरों और मोहल्लों के कनेक्शन अब तक नहीं जोड़े गए हैं। कुछ जगह पाइपलाइनों का लेवल और ढलान भी सही नहीं है। ऐसे में करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी गंदे पानी की निकासी ठीक से नहीं हो पा रही। वहीं पुराने बड़े नालों पर अतिक्रमण के कारण उनकी चौड़ाई भी लगातार कम होती गई है।
प्रयागराज में पहले कई तालाब और खाली जमीनें बारिश के पानी को प्राकृतिक रूप से सोखने का काम करती थीं। लेकिन समय के साथ इन पर मकान और अन्य निर्माण हो गए। कई जगह 15 से 20 फीट चौड़े नाले अतिक्रमण के कारण आधे से भी कम रह गए हैं। जॉर्ज टाउन से सोहबतियाबाग की ओर जाने वाले नाले का उदाहरण इसका साफ संकेत है। ऐसे में तेज बारिश होने पर पानी के पास निकलने का पर्याप्त रास्ता नहीं बचता और सड़कें व रिहायशी इलाके जलमग्न हो जाते हैं। यानी हर साल होने वाले जलभराव से निपटने के लिए सिर्फ नालों की सफाई नहीं, बल्कि अतिक्रमण हटाने, सीवर नेटवर्क सुधारने और पुराने जल स्रोतों को बचाने की जरूरत है।