प्रयागराज न्यूज डेस्क: गंगा संरक्षण और भूजल संकट से निपटने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिली है। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG), सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड और CSIR-नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (NGRI) के संयुक्त प्रयासों से प्रयागराज से कानपुर तक एक विशाल भूमिगत नदी चैनल की मैपिंग की गई है। इस परियोजना के तहत हेलिबोर्न सर्वे के जरिए 5,000 लाइनर किलोमीटर से अधिक डेटा एकत्र किया गया और 2022 में इसकी तकनीकी रिपोर्ट तैयार की गई।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस भूमिगत नदी की कुल लंबाई अब लगभग 200 किलोमीटर तक मैप की जा चुकी है। यह खोज सिर्फ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि देश के बढ़ते जल संकट के संदर्भ में भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि गंगा और यमुना के बीच स्थित यह प्राचीन नदी चैनल एक विशाल प्राकृतिक एक्विफर की तरह काम कर सकता है, जो भूजल को संग्रहित करने की क्षमता रखता है।
शोध में पाया गया है कि इस पेलियो-चैनल की संरचना अत्यधिक छिद्रयुक्त और जल पारगम्य है, जिससे पानी आसानी से इसमें जमा हो सकता है। वैज्ञानिकों ने प्रयागराज और कानपुर के बीच छह ऐसे स्थानों की पहचान की है, जहां कृत्रिम भूजल रिचार्ज किया जा सकता है। इससे न सिर्फ भूमिगत नदी पुनर्जीवित होगी, बल्कि गंगा-यमुना क्षेत्र के सूखते भूजल स्तर को भी सहारा मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह संरचना जल संरक्षण और मैनेज्ड एक्विफर रिचार्ज के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने अभी इस भूमिगत चैनल को सीधे तौर पर सरस्वती नदी घोषित करने से इनकार किया है। उनका कहना है कि इसके लिए और ऐतिहासिक व भूवैज्ञानिक साक्ष्यों की आवश्यकता है। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि यह चैनल उसी भौगोलिक क्षेत्र में मिला है, जहां वैदिक साहित्य में सरस्वती नदी के प्रवाह का उल्लेख मिलता है। अब वैज्ञानिक यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह भूमिगत नदी पश्चिम दिशा में कितनी दूर तक फैली हुई है और क्या इसका संबंध हिमालयी नदी तंत्र से है।